मुंबई, फरवरी 2026 : हमें भारी मन से अपने दर्शकों को यह सूचित करना पड़ रहा है कि राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद में निर्धारित Hun Nathuram के मंचन को मजबूरन रद्द करना पड़ा है।सभी आवश्यक अनुमतियाँ, अर्थात स्थानीय पुलिस की अनुमति, गुजरात सेंसर प्रमाणपत्र तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नाटक के मंचन की अनुमति प्राप्त होने के बावजूद, निरंतर मिल रही धमकियों, दबाव और भय के वातावरण के कारण हमें इन प्रदर्शनों को स्थगित करना पड़ा।
हम स्पष्ट और सम्मानपूर्वक कहना चाहते हैं कि हम संवाद में विश्वास रखते हैं, विघटन में नहीं। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार रखने और व्यक्त करने का अधिकार है। यदि किसी को नाटक की विषयवस्तु से असहमति है, तो वह उसकी आलोचना कर सकता है, कानूनी चुनौती दे सकता है या शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध दर्ज करा सकता है। किंतु धमकी, दबाव या असामाजिक तत्वों के माध्यम से किसी मंचन को रुकवाना लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की मूल भावना को आहत करता है।
हुन नाथूराम प्रलेखित न्यायालयीन कार्यवाही और प्रकाशित पुस्तक पर आधारित है। यह न तो किसी का महिमामंडन करता है और न ही किसी की निंदा। इसका उद्देश्य केवल ऐतिहासिक तथ्यों को उसी रूप में प्रस्तुत करना है, ताकि दर्शक स्वयं विचार कर सकें और अपना मत बना सकें। रंगकर्मियों के रूप में हमारी प्रतिबद्धता मंच और सत्यनिष्ठ प्रस्तुति के प्रति है, किसी राजनीतिक पक्ष के प्रति नहीं।
खुलेपन और पारदर्शिता की भावना से हमने नाटक का विरोध करने वालों को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया था कि वे पहले नाटक देखें और उसके बाद अपनी आपत्तियाँ रखें। हमने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि उन्हें कोई अंश आपत्तिजनक या तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण प्रतीत हो, तो हम विधिसम्मत और तर्कसंगत सुझावों के आधार पर उसकी समीक्षा कर उसे हटाने के लिए भी तैयार हैं। दुर्भाग्यवश, संवाद के लिए कोई आगे नहीं आया। (Hun Nathuram)
बिना नाटक देखे ही विरोध का रास्ता चुना गया।पिछले वर्षों में हम इस नाटक के 50 से अधिक सफल मंचन हिंदी, अंग्रेज़ी और गुजराती में दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, जोधपुर सहित अनेक शहरों में कर चुके हैं। सभी प्रस्तुतियाँ शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुईं और उन्हें आलोचकों, फिल्म एवं सामाजिक जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तियों तथा जागरूक नागरिकों द्वारा सराहा गया। हर स्थान पर स्वस्थ और सभ्य संवाद हुआ, जैसा कि एक परिपक्व समाज में अपेक्षित है।
इसलिए यह और भी पीड़ादायक है कि सत्य और अहिंसा की भूमि से जुड़े प्रदेश में कलात्मक अभिव्यक्ति को भय और दबाव के माध्यम से रोका जा रहा है। हम यह बात क्रोध से नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा के साथ कह रहे हैं। महात्मा गांधी ने संवाद, बहस और अहिंसा का मार्ग दिखाया था। असहमति भी उसी मार्ग से व्यक्त होनी चाहिए।इन रद्द प्रदर्शनों से हमें आर्थिक हानि हुई है, हमारे कलाकारों और तकनीशियनों को मानसिक आघात पहुँचा है, और उन दर्शकों को निराशा हुई है, जिन्होंने विश्वास के साथ टिकटें बुक की थीं। महीनों की मेहनत अचानक ठहर गई। (Hun Nathuram)
यह केवल एक नाटक का प्रश्न नहीं है। आज हुन नाथूराम है, कल कोई और रचना हो सकती है। जब कानूनी अनुमति और संवैधानिक संरक्षण प्राप्त प्रस्तुतियों को दबाव में रद्द करना पड़ता है, तो यह कलात्मक स्वतंत्रता की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
हम विनम्रतापूर्वक सरकार और माननीय विधायकों से निवेदन करते हैं कि वे इस विषय को गंभीरता से संज्ञान में लें। हम कानून का पालन करने वाले रंगकर्मी हैं। हमें मार्गदर्शन, समर्थन और संरक्षण की आवश्यकता है। हम भय के वातावरण में कार्य नहीं करना चाहते। हम केवल कानून की परिधि में, शांति और गरिमा के साथ मंचन करना चाहते हैं। आपका संरक्षण केवल हमें ही नहीं, बल्कि संपूर्ण कलात्मक समुदाय के विश्वास को सुदृढ़ करेगा।
हम रंगमंच जगत, सांस्कृतिक संस्थाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास रखने वाले सभी नागरिकों से भी विनम्र अपील करते हैं कि वे शांतिपूर्ण कलात्मक संवाद के पक्ष में खड़े हों। कला विचार, विमर्श और आत्मचिंतन का माध्यम है, भय और दबाव का नहीं।
हम मंच, विधि और सभ्य संवाद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं। हमें आशा है कि विवेक, शांति और पारस्परिक सम्मान का वातावरण स्थापित होगा, और रंगमंच सुरक्षा, गरिमा और स्वतंत्रता के साथ आगे बढ़ता रहेगा।मंच को बोलने दीजिए। कला को साँस लेने दीजिए। दर्शकों को निर्णय करने दीजिए। (Hun Nathuram)
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