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क्या कछुआ (Tortoise) -खरगोश की राजनीतिक रेस में भी कछुआ ही बाजी मारने में कामयाब होगा? – अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

नवटाइम्स न्यूज़ by नवटाइम्स न्यूज़
April 3, 2024
in राष्ट्रिय
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Tortoise

Tortoise – हममे से हर किसी ने कछुए और खरगोश की कहानी जरूर सुनी होगी। खरगोश तेज रफ़्तार के बाद भी अति-आत्मविश्वास का शिकार हो जाता है और कछुआ अपनी धीमी रफ़्तार से लगातार आगे बढ़ते हुए जीत सुनिश्चित कर लेता है। अगर यूं कहें कि आगामी लोकसभा चुनाव के वर्तमान परिदृश्य में कुछ ऐसी ही स्थिति बनती नजर आ रही है तो संभवतः बहुत से राजनीतिक जानकर इसे मनगढंत कहानी बताएं, लेकिन जैसे जरुरी नहीं कि हर बार तेज तफ्तार ही जीत का आधार बने, वैसे ही यह भी संभव है कि अति-आत्मविश्वास के घोड़े पर सवार एनडीए या बीजेपी को कटी पतंग की तरह गोते खा रही इंडिया अलायंस या कांग्रेस के हाथों मुँह की खानी पड़ जाए। क्या पता जिस कॉन्फिडेंस के साथ पीएम मोदी ने बीजेपी के लिए 370 और एनडीए के लिए 400 पार का लक्ष्य रखा है,

वह सिर्फ एक नारे तक ही सीमित रह जाए, और दिशा विहीन समझे जाने वाली कांग्रेस या विपक्षी गठबंधन, अपने सतत प्रयास के भरोसे, ताबूत की अंतिम कील बनकर उभरे। चूंकि पीएम मोदी का करिश्मा कम से कम बीजेपी कार्यकर्ता और समर्थकों पर तो इस कदर सवार है कि यदि उन्हें नींद से भी उठा कर पूछें तो अबकी बार चार सौ पार का नारा लगाते ही नजर आएंगे लेकिन शायद उनका यही उत्साह उन्हें मतदान केंद्रों तक भी न पहुंचा पाए। चूँकि सब (एनडीए के संभावित मतदाता) यही मानकर चल रहे हैं कि ‘आएगा तो मोदी ही’ और उनकी यही सोच उन्हें ये भी सोचने पर मजबूर कर दे कि जब आना मोदी को ही है तो फिर उनके एक मत से क्या ही फर्क पड़ना है।

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और यदि यह विचार इसी दिशा में आगे बढ़ा तो बीजेपी या एनडीए को सतर्क हो जाने की जरुरत है। बहरहाल इसे भी राजनीति में पकाये जाने वाले ख़याली पुलाव की श्रेणी में रखा जा सकता है लेकिन कुछ तकनीकी पहलु भी हैं जो फिलहाल कछुए (Tortoise) की भूमिका में चल रहे विपक्षी गठबंधन के लिए खरगोश की भांति एकतरफा रेस जीतती दिख रही एनडीए से बाजी छीनने की ओर इशारा करते हैं। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर मोदी ब्रांड के तहत अपनी तैयारियों में जुटी बीजेपी या एनडीए इस कदर आश्वस्त हैं कि मोदी लहर को आंधी बुला रहे हैं, जिसमें पूरे विपक्ष को धूल की तरह उड़ाने की उम्मीद की जा रही है।

कुछ हद तक इसे सही भी माना जा सकता है क्योंकि विपक्ष चुनाव से दो महीने पूर्व भी संगठित नहीं दिख रहा है और एनडीए या बीजेपी के लिए बूथ स्तर पर भी मजबूत संगठन ही सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। लेकिन महज चुनावी माहौल सेट करने के लिए सोशल मीडिया पर जो मोदी का परिवार तैयार हो रहा है, वह किसके दम पर दक्षिण के राज्यों में बढ़ते विरोध को काबू कर पायेगा? क्योंकि मोदी तो 2019 में भी अपनी लहर चला रहे थे लेकिन दक्षिण के राज्यों ने खुद को इस लहर से दूर रखा था। फिलहाल तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल व आँध्रप्रदेश में महज चार सीटों पर बनी बीजेपी के लिए दक्षिण की लगभग सवा सौ सीटों को भेद पाना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर कांग्रेस के पास दक्षिण के पांच राज्यों में बेहतर परफॉर्म करने का ट्रैक रिकॉर्ड दर्ज है। हाल में हुए मूड ऑफ़ द नेशन सर्वे में भी 132 सीटों पर 76 सीटें विपक्षी गठबंधन के पाले में ही दिखाई जा रही हैं।

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चूंकि चार सौ पार जाने के लिए प्रचंड बहुमत ही एक मात्र सहारा है ऐसे में न केवल हिंदी भाषी बल्कि पूरे देश से एनडीए को भरपूर समर्थन की दरकार होगी। लेकिन फिलहाल उत्तर भारत में सौ फीसदी समर्थन का खांका तैयार कर चल रही बीजेपी को पिछले कुछ पन्ने पलटने की जरुरत है। उत्तर भारत के अंदर आने वाली 320 सीटों के लिए एनडीए या खासकर खुद बीजेपी के लिए पंजाब की 13 सीटों समेत यूपी की 80, राजस्थान की 25 जैसी सभी सीटें जीतने का भारी दवाब होगा। क्योंकि बीजेपी को सहयोगी दलों के भरोसे रहने से अधिक खुद को जोर लगाना होगा, और अपने दम पर ही अधिकतम सीटें हासिल करनी होगी। महाराष्ट्र की 48 सीटें भी ऐसी ही हैं, वहीं बंगाल में सीटों की गिनती बढ़ाने की चुनौती भी बीजेपी या एनडीए के लिए आसान नहीं है। (Tortoise)

ऐसे में यह कह देना कि इस बार भी मोदी की आंधी में सब धुंआ धुंआ हो जाएगा तो गलत होगा। क्योंकि फिलहाल विपक्षी गठबंधन भले कमजोर नजर आ रहा हो और कांग्रेस को लगातार बागी होते नेताओं का दर्द झेलना पड़ रहा हो लेकिन जम्मू-कश्मीर से 370 हटने के बाद की कोई चुनावी स्थिति सामने न आने, चुनावी लाभ के लिए सीएए को लागू करने और इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट के रुख से घिरी बीजेपी के लिए सिर्फ राम मंदिर, पीएम मोदी या योगी आदित्यनाथ का चेहरा ही काम नहीं आएगा। विपक्ष के पास भी यही मुद्दा व अवसर है जिसके सहारे आग में घी का किरदार निभाने की कोशिश की जा सकती है और यदि यह कोशिश सही दिशा में आगे बढ़ती है तो ये कहना भी गलत नहीं होगा कि कछुआ-खरगोश की इस राजनीतिक रेस में भी कछुआ ही बाजी मारने में कामयाब होगा।

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Tags: Atul MalikramBJPLok Sabha ElectionsTortoise
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