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Home खेल

आरुष तिवारी और हिया अदलखा: बर्फ पर अपनी राह गढ़ते दो किशोर फिगर स्केटर्स की Story

हरियाणा की हिया ने केआईवाईजी 2026 में नवोदित (नोविस) गर्ल्स वर्ग में स्वर्ण पदक जीता, जबकि दिल्ली के आरुष ने बॉयज़ वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया

नवटाइम्स न्यूज़ by नवटाइम्स न्यूज़
January 23, 2026
in खेल
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Story

लेह (लद्दाख), जनवरी 2026: बर्फ पर वे अकेले स्केट करते हैं, लेकिन बर्फ के बाहर उनकी यात्रा साहस, त्याग और विश्वास से भरी हुई है। आरुष तिवारी और हिया अदलखा (दोनों नवोदित फिगर स्केटर) भारतीय फिगर स्केटिंग की जेन जी पीढ़ी से हैं, जो ऐसे खेल में बड़े सपने देखने की हिम्मत कर रहे हैं, जो भारत में अभी अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है। भले ही वे भौगोलिक रूप से अलग हों, लेकिन एक जैसी महत्वाकांक्षा उन्हें जोड़ती है। ये दोनों किशोर भारत के बढ़ते आइस स्पोर्ट्स इकोसिस्टम में उम्मीद और प्रेरणा का प्रतीक हैं।

दिल्ली के 14 वर्षीय आरुष तिवारी के लिए (जिन्होंने लेह में चल रहे खेलो इंडिया विंटर गेम्स 2026 में नवोदित बॉयज़ वर्ग में कांस्य पदक जीता) स्केटिंग की शुरुआत इतनी छोटी उम्र में हुई कि उन्हें खुद भी ठीक से याद नहीं। दो साल की उम्र में उन्होंने पहली बार रोलर स्केट्स पहने और जल्द ही संतुलन व लय पकड़ ली। रोलर स्केटिंग में प्रतिस्पर्धात्मक सफलता मिली, लेकिन असली मोड़ तब आया जब उन्होंने आइस स्केटिंग की ओर कदम बढ़ाया। उनके लिए यह एक ऐसा बदलाव था, जिसमें उन्हें सीखी हुई हर चीज़ दोबारा सीखनी पड़ी।

पहियों से ब्लेड तक का यह सफर आरुष के लिए इतना परिवर्तनकारी रहा कि उन्होंने इसे खुद लिखी अपनी किताब व्हील्स टू आइस, बोर्न टू राइज में दर्ज किया। यह किताब उनके व्यक्तिगत सफर को बयां करती है, जिसमें तकनीकी चुनौतियां, मानसिक बदलाव और भावनात्मक उतार-चढ़ाव का जिक्र है। इतनी कम उम्र में एक खिलाड़ी का किताब के माध्यम से यह दुर्लभ आत्ममंथन है।

आरुष ने साई मीडिया से कहा,“शुरुआत में मैं बिल्कुल भी आइस स्केटर नहीं था। आइस पर आना बहुत मुश्किल था, लेकिन एक बार जब मैंने शुरुआत की, तो मुझे समझ आ गया कि मैं यही करना चाहता हूं।”

देहरादून के आइस हिमाद्री रिंक में मुख्य रूप से प्रशिक्षण लेते हुए आरुष ने कोच जे.एस. साहनी के मार्गदर्शन में अपने कौशल को निखारा। धीरे-धीरे प्रगति हुई और जल्द ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करना शुरू कर दिया।

आरुष ने कहा, “मैंने एशियन ओपन (2023) और थाईलैंड ओपन (2024) में हिस्सा लिया और लगातार अपनी श्रेणी के शीर्ष स्केटर्स में रहा। मेरा सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू 2025 में फिलीपींस में हुए एशियन ओपन में आया, जहां मैंने कांस्य पदक जीता। मेरे जैसे युवा भारतीय स्केटर के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।”

एक और अहम पड़ाव रहा ओलंपिक काउंसिल ऑफ एशिया द्वारा चीन के हार्बिन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर के लिए उनका चयन किया जाना। हिया भी उसी शिविर का हिस्सा थीं। तकनीकी प्रशिक्षण से आगे, इस शिविर में एथलीट एजुकेशन पर भी जोर दिया गया, जिसमें एंटी-डोपिंग जागरूकता, सेफगार्डिंग और पेशेवर आचरण शामिल था।

आरुष कहते हैं, “इसने मुझे समझाया कि एक अंतरराष्ट्रीय एथलीट होना वास्तव में क्या मायने रखता है।”

खेलो इंडिया विंटर गेम्स में प्रतिस्पर्धा ने उनकी यात्रा में एक और अध्याय जोड़ा। लेह की ऊंचाई पर स्केटिंग ने उनकी सहनशक्ति और रिकवरी की परीक्षा ली। वह कहते हैं, “कम ऑक्सीजन के कारण यह बहुत चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन यही चुनौतियां हमें बेहतर बनाती हैं।”

यदि आरुष की कहानी बदलाव और आत्म-अभिव्यक्ति की है, तो खेलो इंडिया विंटर गेम्स 2026 में नवोदित गर्ल्स वर्ग की स्वर्ण पदक विजेता 15 वर्षीय हिया अदलखा की कहानी धैर्य और शांत दृढ़ता की है।

हिया का पालन-पोषण खेलों के माहौल में हुआ। उनकी मां सपना गुप्ता अंतरराष्ट्रीय रिदमिक जिम्नास्टिक्स जज हैं और विश्व कप प्रतियोगिताओं में निर्णायक की भूमिका निभाती रही हैं। उनकी बड़ी बहन लाइफ अदलखा ने भी जिम्नास्टिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन चोट के कारण उनका करियर बाधित हो गया। उत्कृष्टता और अनुशासन हिया के वातावरण का हिस्सा रहे हैं, लेकिन फिगर स्केटिंग में अपनी अलग पहचान बनाना उनके लिए अकेलेपन से जूझने जैसा रहा।

https://www.instagram.com/reel/DT2PtrIAXSi/?igsh=MWljZ2NkdWVtYWVxeA==

हिया कहती हैं, “फिगर स्केटिंग एक फुल-टाइम खेल है। हफ्ते में एक बार ट्रेनिंग करके आप नतीजों की उम्मीद नहीं कर सकते।”

देश में योग्य कोचों की सीमित संख्या के कारण, हिया अक्सर अकेले अभ्यास करती हैं। वीडियो का विश्लेषण कर खुद ही अपनी तकनीक सुधारती हैं।

हिया ने कहा, “यह एकांत मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसी ने मुझे आत्मनिर्भर बनाया है। दो साल पहले मेरा इस खेल से रिश्ता और गहरा हुआ, जब मैंने सिर्फ पदकों पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत विकास पर ध्यान देना शुरू किया। फिगर स्केटिंग ने मुझे खुद के और करीब ला दिया।”

हार्बिन का प्रशिक्षण शिविर हिया के लिए भी आंखें खोल देने वाला अनुभव रहा। एशिया भर के स्केटर्स के साथ प्रशिक्षण करते हुए उन्हें विश्व-स्तरीय सुविधाओं और शीर्ष स्तर की प्रतिस्पर्धा का अनुभव मिला।

हिया कहती हैं, “उस अनुभव ने मेरी सोच पूरी तरह बदल दी। इससे भारत का प्रतिनिधित्व करने की मेरी इच्छा और मजबूत हो गई।”

उनकी प्रगति घरेलू स्तर पर भी दिखी। जून 2025 में उन्होंने अपना पहला नेशनल स्वर्ण पदक जीता। इससे पहले वह कई राष्ट्रीय कांस्य पदक जीत चुकी थीं। इंटरमीडिएट नोविस श्रेणी (जो जूनियर स्तर से ठीक नीचे है) में प्रतिस्पर्धा कर रही हिया आगे की कठिन चढ़ाई को भली-भांति समझती हैं।

प्रेरणा उन्हें अलग-अलग दुनिया से मिलती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह अमेरिकी स्केटर एलिसा ल्यू को पसंद करती और उनके पसंदीदा ट्रैक पर परफार्म करती हैं। ल्यू ने सोलह साल की आयु में स्केटिंग छोड़ दी थी लेकिन उन्होंने फिर वापसी करते हुए दुनिया जीत ली थी। देश में उनकी बहन की चोट के बाद वापसी उनकी आस्था को मजबूत करती है।

हिया कहती हैं, “अगर वे (ल्यू और लाइफ) वापसी कर सकती हैं, तो मैं भी कर सकती हूं।”

आरुष और हिया के लिए खेलो इंडिया विंटर गेम्स सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं हैं। फिगर स्केटिंग को शामिल किए जाने से नियमित प्रतिस्पर्धा, बेहतर सुविधाओं और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान के द्वार खुले हैं। लद्दाख और देहरादून में कृत्रिम आइस रिंक चालू हो चुके हैं और आगे भी कई प्रस्तावित हैं—ऐसे में भविष्य अब दूर नहीं लगता।

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